श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.9

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

उत्तरोवाच

पाहि पाहि महायोगिन्देवदेव जगत्पते।

नान्यं१ त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम्॥ ९

pāhi pāhi mahāyogindevadeva jagatpate|

nānyaṃ tvadabhayaṃ paśye yatra mṛtyuḥ parasparam|| 9

अर्थ

उत्तराने कहा—देवाधिदेव! जगदीश्‍वर! आप महायोगी हैं। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतिरिक्त इस लोकमें मुझे अभय देनेवाला और कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी परस्पर एक-दूसरेकी मृत्युके निमित्त बन रहे हैं॥ ९॥✎ 1914

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—नान्यत्र त्वभयं।

    (मुद्रित पृष्ठ 114)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1914 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सर्व-शक्तिमान् → सर्वशक्तिमान्

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