॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.9.40
ललितगतिविलासवल्गुहासप्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः।✎ 1517
कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः॥ ४०
lalitagativilāsavalguhāsapraṇayanirīkṣaṇakalpitorumānāḥ|
kṛtamanukṛtavatya unmadāndhāḥ prakṛtimagan kila yasya gopavadhvaḥ|| 40
अर्थ
जिनकी लटकीली सुन्दर चाल, हाव-भावयुक्त चेष्टाएँ, मधुर मुसकान और प्रेमभरी चितवनसे अत्यन्त सम्मानित गोपियाँ रासलीलामें उनके अन्तर्धान हो जानेपर प्रेमोन्मादसे मतवाली होकर जिनकी लीलाओंका अनुकरण करके तन्मय हो गयी थीं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णमें मेरा परम प्रेम हो॥ ४०॥✎ 1577