श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.42

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम्।

प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः॥ ४२

tamimamahamajaṃ śarīrabhājāṃ hṛdi hṛdi dhiṣṭhitamātmakalpitānām|

pratidṛśamiva naikadhārkamekaṃ samadhigato'smi vidhūtabhedamohaḥ|| 42

अर्थ

जैसे एक ही सूर्य अनेक आँखोंसे अनेक रूपोंमें दीखते हैं, वैसे ही अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपने ही द्वारा रचित अनेक शरीरधारियोंके हृदयमें अनेक रूपसे जान पड़ते हैं; वास्तवमें तो वे एक और सबके हृदयमें विराजमान हैं ही। उन्हीं इन भगवान् श्रीकृष्णको मैं भेद-भ्रमसे रहित होकर प्राप्त हो गया हूँ ॥ ४२॥✎ 1577

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1577 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रूप-से → रूपसे

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