श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

विष्णोर्माया भगवती यया सम्मोहितं जगत्।

आदिष्टा प्रभुणांशेन कार्यार्थे सम्भविष्यति॥ २५

viṣṇormāyā bhagavatī yayā sammohitaṃ jagat|

ādiṣṭā prabhuṇāṃśena kāryārthe sambhaviṣyati|| 25

अर्थ

भगवान्‌की वह ऐश्‍वर्यशालिनी योगमाया भी, जिसने सारे जगत‍्को मोहित कर रखा है, उनकी आज्ञासे उनकी लीलाके कार्य सम्पन्‍न करनेके लिये अंशरूपसे अवतार ग्रहण करेगी’॥ २५॥

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