श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

व्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति।

यथा तृणजलूकैवं देही कर्मगतिं गतः॥ ४०

vrajaṃstiṣṭhan padaikena yathaivaikena gacchati|

yathā tṛṇajalūkaivaṃ dehī karmagatiṃ gataḥ|| 40

अर्थ

जैसे चलते समय मनुष्य एक पैर जमाकर ही दूसरा पैर उठाता है और जैसे जोंक किसी अगले तिनकेको पकड़ लेती है, तब पहलेके पकड़े हुए तिनकेको छोड़ती है—वैसे जीव भी अपने कर्मके अनुसार किसी शरीरको प्राप्त करनेके बाद ही इस शरीरको छोड़ता है॥ ४०॥

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