श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

विपर्ययो वा किं न स्याद् गतिर्धातुर्दुरत्यया।

उपस्थितो निवर्तेत निवृत्तः पुनरापतेत्॥ ५०

viparyayo vā kiṃ na syād gatirdhāturduratyayā|

upasthito nivarteta nivṛttaḥ punarāpatet|| 50

अर्थ

सम्भव है, उलटा ही हो। मेरा लड़का ही इसे मार डाले! क्योंकि विधाताके विधानका पार पाना बहुत कठिन है । मृत्यु सामने आकर भी टल जाती है और टली हुई भी लौट आती है॥ ५०॥

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