परीक्षित्! पृथ्वीमें यह बात प्रायः देखी जाती है कि अपने प्राणोंका ही पोषण करनेवाले लोभी राजा अपने स्वार्थके लिये माता-पिता, भाई-बन्धु और अपने अत्यन्त हितैषी इष्ट-मित्रोंकी भी हत्या कर डालते हैं॥ ६७॥
मातरं पितरं भ्रातॄन् सर्वांश्च सुहृदस्तथा।
घ्नन्ति ह्यसुतृपो लुब्धा राजानः प्रायशो भुवि॥ ६७
परीक्षित्! पृथ्वीमें यह बात प्रायः देखी जाती है कि अपने प्राणोंका ही पोषण करनेवाले लोभी राजा अपने स्वार्थके लिये माता-पिता, भाई-बन्धु और अपने अत्यन्त हितैषी इष्ट-मित्रोंकी भी हत्या कर डालते हैं॥ ६७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.67 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 127) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/1/67/