गोकुलसे वृन्दावन जाना तथा वत्सासुर और बकासुरका उद्धार
श्रीशुक उवाच
गोपा नन्दादयः श्रुत्वा द्रुमयोः पततो रवम्।
तत्राजग्मुः कुरुश्रेष्ठ निर्घातभयशंकिताः॥ १
gopā nandādayaḥ śrutvā drumayoḥ patato ravam|
tatrājagmuḥ kuruśreṣṭha nirghātabhayaśaṃkitāḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वृक्षोंके गिरनेसे जो भयंकर शब्द हुआ था, उसे नन्दबाबा आदि गोपोंने भी सुना। उनके मनमें यह शंका हुई कि कहीं बिजली तो नहीं गिरी! सब-के-सब भयभीत होकर वृक्षोंके पास आ गये॥ १॥
गोपा नन्दादयः श्रुत्वा द्रुमयोः पततो रवम्।
तत्राजग्मुः कुरुश्रेष्ठ निर्घातभयशंकिताः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वृक्षोंके गिरनेसे जो भयंकर शब्द हुआ था, उसे नन्दबाबा आदि गोपोंने भी सुना। उनके मनमें यह शंका हुई कि कहीं बिजली तो नहीं गिरी! सब-के-सब भयभीत होकर वृक्षोंके पास आ गये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.11.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 196) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/11/1/