श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

वनं वृन्दावनं नाम पशव्यं नवकाननम्।

गोपगोपीगवां सेव्यं पुण्याद्रितृणवीरुधम्॥ २८

vanaṃ vṛndāvanaṃ nāma paśavyaṃ navakānanam|

gopagopīgavāṃ sevyaṃ puṇyādritṛṇavīrudham|| 28

अर्थ

‘वृन्दावन’ नामका एक वन है। उसमें छोटे-छोटे और भी बहुत-से नये-नये हरे-भरे वन हैं। वहाँ बड़ा ही पवित्र पर्वत, घास और हरी-भरी लता-वनस्पतियाँ हैं। हमारे पशुओंके लिये तो वह बहुत ही हितकारी है। गोप, गोपी और गायोंके लिये वह केवल सुविधाका ही नहीं, सेवन करनेयोग्य स्थान है॥ २८॥

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