श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.54

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

श्रुत्वा तद् विस्मिता गोपा गोप्यश्‍चातिप्रियादृताः।

प्रेत्यागतमिवौत्सुक्यादैक्षन्त तृषितेक्षणाः॥ ५४

śrutvā tad vismitā gopā gopyaścātipriyādṛtāḥ|

pretyāgatamivautsukyādaikṣanta tṛṣitekṣaṇāḥ|| 54

अर्थ

परीक्षित्! बकासुरके वधकी घटना सुनकर सब-के-सब गोपी-गोप आश्‍चर्यचकित हो गये। उन्हें ऐसा जान पड़ा, जैसे कन्हैया साक्षात् मृत्युके मुखसे ही लौटे हों। वे बड़ी उत्सुकता, प्रेम और आदरसे श्रीकृष्णको निहारने लगे। उनके नेत्रोंकी प्यास बढ़ती ही जाती थी, किसी प्रकार उन्हें तृप्ति न होती थी॥ ५४॥

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