श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

इति व्यवस्याजगरं बृहद् वपुः

स योजनायाममहाद्रिपीवरम्।

धृत्वाद्भुतं व्यात्तगुहाननं तदा

पथि व्यशेत ग्रसनाशया खलः॥ १६

iti vyavasyājagaraṃ bṛhad vapuḥ

sa yojanāyāmamahādripīvaram|

dhṛtvādbhutaṃ vyāttaguhānanaṃ tadā

pathi vyaśeta grasanāśayā khalaḥ|| 16

अर्थ

ऐसा निश्‍चय करके वह दुष्ट दैत्य अजगरका रूप धारण कर मार्गमें लेट गया। उसका वह अजगर-शरीर एक योजन लंबे बड़े पर्वतके समान विशाल एवं मोटा था। वह बहुत ही अद्भुत था। उसकी नीयत सब बालकोंको निगल जानेकी थी, इसलिये उसने गुफाके समान अपना बहुत बड़ा मुँह फाड़ रखा था॥ १६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें