श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तेनैव साकं पृथुकाः सहस्रशः

स्निग्धाः सुशिग्वेत्रविषाणवेणवः।

स्वान् स्वान् सहस्रोपरिसंख्ययान्वितान्

वत्सान् पुरस्कृत्य विनिर्ययुर्मुदा॥ २

tenaiva sākaṃ pṛthukāḥ sahasraśaḥ

snigdhāḥ suśigvetraviṣāṇaveṇavaḥ|

svān svān sahasroparisaṃkhyayānvitān

vatsān puraskṛtya viniryayurmudā|| 2

अर्थ

श्रीकृष्णके साथ ही उनके प्रेमी सहस्रों ग्वालबाल सुन्दर छीके, बेंत, सिंगी और बाँसुरी लेकर तथा अपने सहस्रों बछड़ोंको आगे करके बड़ी प्रसन्‍नतासे अपने-अपने घरोंसे चल पड़े॥ २॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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