॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.25
इत्थं मिथोऽतथ्यमतज्ज्ञभाषितं
श्रुत्वा विचिन्त्येत्यमृषा मृषायते।
रक्षो विदित्वाखिलभूतहृत्स्थितः
स्वानां निरोद्धुं भगवान् मनो दधे॥ २५
itthaṃ mitho'tathyamatajjñabhāṣitaṃ
śrutvā vicintyetyamṛṣā mṛṣāyate|
rakṣo viditvākhilabhūtahṛtsthitaḥ
svānāṃ niroddhuṃ bhagavān mano dadhe|| 25
अर्थ
उन अनजान बच्चोंकी आपसमें की हुई भ्रमपूर्ण बातें सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने सोचा कि ‘अरे, इन्हें तो सच्चा सर्प भी झूठा प्रतीत होता है!’ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण जान गये कि यह राक्षस है। भला, उनसे क्या छिपा रहता? वे तो समस्त प्राणियोंके हृदयमें ही निवास करते हैं। अब उन्होंने यह निश्चय किया कि अपने सखा ग्वालबालोंको उसके मुँहमें जानेसे बचा लें॥ २५॥