श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तान् वीक्ष्य कृष्णः सकलाभयप्रदो

ह्यनन्यनाथान् स्वकरादवच्युतान्।

दीनांश्‍च मृत्योर्जठराग्‍निघासान्

घृणार्दितो दिष्टकृतेन विस्मितः॥ २७

tān vīkṣya kṛṣṇaḥ sakalābhayaprado

hyananyanāthān svakarādavacyutān|

dīnāṃśca mṛtyorjaṭharāgnighāsān

ghṛṇārdito diṣṭakṛtena vismitaḥ|| 27

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण सबको अभय देनेवाले हैं। जब उन्होंने देखा कि ये बेचारे ग्वालबाल— जिनका एकमात्र रक्षक मैं ही हूँ—मेरे हाथसे निकल गये और जैसे कोई तिनका उड़कर आगमें गिर पड़े, वैसे ही अपने-आप मृत्युरूप अघासुरकी जठराग्‍निके ग्रास बन गये, तब दैवकी इस विचित्र लीलापर भगवान्‌को बड़ा विस्मय हुआ और उनका हृदय दयासे द्रवित हो गया॥ २७॥

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