भरतवंशशिरोमणे! इस प्रकार भोजन करते-करते ग्वालबाल भगवान्की इस रसमयी लीलामें तन्मय हो गये। उसी समय उनके बछड़े हरी-हरी घासके लालचसे घोर जंगलमें बड़ी दूर निकल गये॥ १२॥
भारतैवं वत्सपेषु भुंजानेष्वच्युतात्मसु।
वत्सास्त्वन्तर्वने दूरं विविशुस्तृणलोभिताः॥ १२
भरतवंशशिरोमणे! इस प्रकार भोजन करते-करते ग्वालबाल भगवान्की इस रसमयी लीलामें तन्मय हो गये। उसी समय उनके बछड़े हरी-हरी घासके लालचसे घोर जंगलमें बड़ी दूर निकल गये॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 212) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/12/