श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अम्भोजन्मजनिस्तदन्तरगतो मायार्भकस्येशितु-

र्द्रष्टुं मंजु महित्वमन्यदपि तद्वत्सानितो वत्सपान्।

नीत्वान्यत्र कुरूद्वहान्तरदधात् खेऽवस्थितो यः पुरा

दृष्ट्वाघासुरमोक्षणं प्रभवतः प्राप्तः परं विस्मयम्॥ १५

ambhojanmajanistadantaragato māyārbhakasyeśitu-

rdraṣṭuṃ maṃju mahitvamanyadapi tadvatsānito vatsapān|

nītvānyatra kurūdvahāntaradadhāt khe'vasthito yaḥ purā

dṛṣṭvāghāsuramokṣaṇaṃ prabhavataḥ prāptaḥ paraṃ vismayam|| 15

अर्थ

परीक्षित्! ब्रह्माजी पहलेसे ही आकाशमें उपस्थित थे। प्रभुके प्रभावसे अघासुरका मोक्ष देखकर उन्हें बड़ा आश्‍चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि लीलासे मनुष्य-बालक बने हुए भगवान् श्रीकृष्णकी कोई और मनोहर महिमामयी लीला देखनी चाहिये। ऐसा सोचकर उन्होंने पहले तो बछड़ोंको और भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर ग्वाल-बालोंको भी, अन्यत्र ले जाकर रख दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये। अन्ततः वे जड़ कमलकी ही तो सन्तान हैं॥ १५॥

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