श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

व्रजौकसां स्वतोकेषु स्नेहवल्‍ल्याब्दमन्वहम्।✎ 2070

शनैर्निःसीम ववृधे यथा कृष्णे त्वपूर्ववत्॥ २६

vrajaukasāṃ svatokeṣu snehavallyābdamanvaham|

śanairniḥsīma vavṛdhe yathā kṛṣṇe tvapūrvavat|| 26

अर्थ

अपने-अपने बालकोंके प्रति व्रजवासियोंकी स्नेह-लता दिन-प्रतिदिन एक वर्षतक धीरे-धीरे बढ़ती ही गयी। यहाँतक कि पहले श्रीकृष्णमें उनका जैसा असीम और अपूर्व प्रेम था, वैसा ही अपने इन बालकोंके प्रति भी हो गया॥ २६॥✎ 1927

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1927 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): व्रज-वासियोंकी → व्रजवासियोंकी
  • #2070 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): हवल्‍लॺाब्द → हवल्‍ल्याब्द

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