श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

किमेतदद्भुतमिव वासुदेवेऽखिलात्मनि।

व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते॥ ३६

kimetadadbhutamiva vāsudeve'khilātmani|

vrajasya sātmanastokeṣvapūrvaṃ prema vardhate|| 36

अर्थ

‘यह कैसी विचित्र बात है! सर्वात्मा श्रीकृष्णमें व्रजवासियोंका और मेरा जैसा अपूर्व स्नेह है, वैसा ही इन बालकों और बछड़ोंपर भी बढ़ता जा रहा है॥ ३६॥

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