वे सोचने लगे—‘गोकुलमें जितने भी ग्वालबाल और बछड़े थे, वे तो मेरी मायामयी शय्यापर सो रहे हैं—उनको तो मैंने अपनी मायासे अचेत कर दिया था; वे तबसे अबतक सचेत नहीं हुए॥ ४१॥
यावन्तो गोकुले बालाः सवत्साः सर्व एव हि।
मायाशये शयाना मे नाद्यापि पुनरुत्थिताः॥ ४१
वे सोचने लगे—‘गोकुलमें जितने भी ग्वालबाल और बछड़े थे, वे तो मेरी मायामयी शय्यापर सो रहे हैं—उनको तो मैंने अपनी मायासे अचेत कर दिया था; वे तबसे अबतक सचेत नहीं हुए॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 216) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/41/