उनकी मुसकान चाँदनीके समान उज्ज्वल थी और रतनारे नेत्रोंकी कटाक्षपूर्ण चितवन बड़ी ही मधुर थी। ऐसा जान पड़ता था मानो वे इन दोनोंके द्वारा सत्त्वगुण और रजोगुणको स्वीकार करके भक्तजनोंके हृदयमें शुद्ध लालसाएँ जगाकर उनको पूर्ण कर रहे हैं॥ ५०॥✎ 1661
चन्द्रिकाविशदस्मेरैः सारुणापांगवीक्षितैः।
स्वकार्थानामिव रजःसत्त्वाभ्यां स्रष्टृपालकाः॥ ५०
उनकी मुसकान चाँदनीके समान उज्ज्वल थी और रतनारे नेत्रोंकी कटाक्षपूर्ण चितवन बड़ी ही मधुर थी। ऐसा जान पड़ता था मानो वे इन दोनोंके द्वारा सत्त्वगुण और रजोगुणको स्वीकार करके भक्तजनोंके हृदयमें शुद्ध लालसाएँ जगाकर उनको पूर्ण कर रहे हैं॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 217) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)