श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

कालस्वभावसंस्कारकामकर्मगुणादिभिः।

स्वमहिध्वस्तमहिभिर्मूर्तिमद्भिरुपासिताः॥ ५३

kālasvabhāvasaṃskārakāmakarmaguṇādibhiḥ|

svamahidhvastamahibhirmūrtimadbhirupāsitāḥ|| 53

अर्थ

प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाला काल, उसके परिणामका कारण स्वभाव, वासनाओंको जगानेवाला संस्कार, कामनाएँ, कर्म, विषय और फल—सभी मूर्तिमान् होकर भगवान्‌के प्रत्येक रूपकी उपासना कर रहे हैं। भगवान्‌की सत्ता और महत्ताके सामने उन सभीकी सत्ता और महत्ता अपना अस्तित्व खो बैठी थी॥ ५३॥✎ 1925

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1925 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): एक-रस → एकरस

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