kṛcchrādunmīlya vai dṛṣṭīrācaṣṭedaṃ sahātmanā|| 58
अर्थ
इससे ब्रह्माजीको बाह्यज्ञान हुआ। वे मानो मरकर फिर जी उठे। सचेत होकर उन्होंने ज्यों-त्यों करके बड़े कष्टसे अपने नेत्र खोले। तब कहीं उन्हें अपना शरीर और यह जगत् दिखायी पड़ा॥ ५८॥✎ 1662
ततोऽर्वाक् प्रतिलब्धाक्षः कः परेतवदुत्थितः।
कृच्छ्रादुन्मील्य वै दृष्टीराचष्टेदं सहात्मना॥ ५८
इससे ब्रह्माजीको बाह्यज्ञान हुआ। वे मानो मरकर फिर जी उठे। सचेत होकर उन्होंने ज्यों-त्यों करके बड़े कष्टसे अपने नेत्र खोले। तब कहीं उन्हें अपना शरीर और यह जगत् दिखायी पड़ा॥ ५८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.58 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 219) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/58/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)