श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

ततोऽर्वाक् प्रतिलब्धाक्षः कः परेतवदुत्थितः।

कृच्छ्रादुन्मील्य वै दृष्टीराचष्टेदं सहात्मना॥ ५८

tato'rvāk pratilabdhākṣaḥ kaḥ paretavadutthitaḥ|

kṛcchrādunmīlya vai dṛṣṭīrācaṣṭedaṃ sahātmanā|| 58

अर्थ

इससे ब्रह्माजीको बाह्यज्ञान हुआ। वे मानो मरकर फिर जी उठे। सचेत होकर उन्होंने ज्यों-त्यों करके बड़े कष्टसे अपने नेत्र खोले। तब कहीं उन्हें अपना शरीर और यह जगत् दिखायी पड़ा॥ ५८॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें