॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.1
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
ब्रह्माजीके द्वारा भगवान्की स्तुति
ब्रह्मोवाच
नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय
गुंजावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय ।
वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु-
लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय॥ १
naumīḍya te'bhravapuṣe taḍidambarāya
guṃjāvataṃsaparipicchalasanmukhāya |
vanyasraje kavalavetraviṣāṇaveṇu-
lakṣmaśriye mṛdupade paśupāṅgajāya|| 1
अर्थ
ब्रह्माजीने स्तुति की—प्रभो! एकमात्र आप ही स्तुति करनेयोग्य हैं। मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ। आपका यह शरीर वर्षाकालीन मेघके समान श्यामल है, इसपर स्थिर बिजलीके समान झिलमिल-झिलमिल करता हुआ पीताम्बर शोभा पाता है, आपके गलेमें घुँघचीकी माला, कानोंमें मकराकृति कुण्डल तथा सिरपर मोरपंखोंका मुकुट है, इन सबकी कान्तिसे आपके मुखपर अनोखी छटा छिटक रही है। वक्षःस्थलपर लटकती हुई वनमाला और नन्ही-सी हथेलीपर दही-भातका कौर। बगलमें बेंत और सिंगी तथा कमरकी फेंटमें आपकी पहचान बतानेवाली बाँसुरी शोभा पा रही है। आपके कमल-से सुकोमल परम सुकुमार चरण और यह गोपाल-बालकका सुमधुर वेष। (मैं और कुछ नहीं जानता; बस, मैं तो इन्हीं चरणोंपर निछावर हूँ)॥ १॥✎ 1931