श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अत्रैव मायाधमनावतारे

ह्यस्य प्रपंचस्य बहिः स्फुटस्य।

कृत्स्नस्य चान्तर्जठरे जनन्या

मायात्वमेव प्रकटीकृतं ते॥ १६

atraiva māyādhamanāvatāre

hyasya prapaṃcasya bahiḥ sphuṭasya|

kṛtsnasya cāntarjaṭhare jananyā

māyātvameva prakaṭīkṛtaṃ te|| 16

अर्थ

मायाका नाश करनेवाले प्रभो! दूरकी बात कौन करे—अभी इसी अवतारमें आपने इस बाहर दीखनेवाले जगत‍्को अपने पेटमें ही दिखला दिया, जिसे देखकर माता यशोदा चकित हो गयी थीं। इससे यही तो सिद्ध होता है कि यह सम्पूर्ण विश्‍व केवल आपकी माया-ही-माया है॥ १६॥✎ 1421

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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