॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.23
एकस्त्वमात्मा पुरुषः पुराणः
सत्यः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः।
नित्योऽक्षरोऽजस्रसुखो निरंजनः
पूर्णोऽद्वयो मुक्त उपाधितोऽमृतः॥ २३
ekastvamātmā puruṣaḥ purāṇaḥ
satyaḥ svayaṃjyotirananta ādyaḥ|
nityo'kṣaro'jasrasukho niraṃjanaḥ
pūrṇo'dvayo mukta upādhito'mṛtaḥ|| 23
अर्थ
प्रभो! आप ही एकमात्र सत्य हैं। क्योंकि आप सबके आत्मा जो हैं। आप पुराणपुरुष होनेके कारण समस्त जन्मादि विकारोंसे रहित हैं। आप स्वयंप्रकाश हैं; इसलिये देश, काल और वस्तु—जो परप्रकाश हैं—किसी प्रकार आपको सीमित नहीं कर सकते । आप उनके भी आदि प्रकाशक हैं। आप अविनाशी होनेके कारण नित्य हैं। आपका आनन्द अखण्डित है। आपमें न तो किसी प्रकारका मल है और न अभाव। आप पूर्ण, एक हैं। समस्त उपाधियोंसे मुक्त होनेके कारण आप अमृतस्वरूप हैं॥ २३॥