श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-

प्रसादलेशानुगृहीत एव हि।

जानाति तत्त्वं भगवन् महिम्‍नो

न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ २९

athāpi te deva padāmbujadvaya-

prasādaleśānugṛhīta eva hi|

jānāti tattvaṃ bhagavan mahimno

na cānya eko'pi ciraṃ vicinvan|| 29

अर्थ

अपने भक्तजनोंके हृदयमें स्वयं स्फुरित होनेवाले भगवन्! आपके ज्ञानका स्वरूप और महिमा ऐसी ही है, उससे अज्ञानकल्पित जगत‍्का नाश हो जाता है। फिर भी जो पुरुष आपके युगल चरणकमलोंका तनिक-सा भी कृपा-प्रसाद प्राप्त कर लेता है, उससे अनुगृहीत हो जाता है—वही आपकी सच्चिदानन्दमयी महिमाका तत्त्व जान सकता है। दूसरा कोई भी ज्ञान-वैराग्यादि साधनरूप अपने प्रयत्‍नसे बहुत कालतक कितना भी अनुसन्धान करता रहे, वह आपकी महिमाका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता॥ २९॥

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