श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अहोऽतिधन्या व्रजगोरमण्यः

स्तन्यामृतं पीतमतीव ते मुदा।

यासां विभो वत्सतरात्मजात्मना

यत्तृप्तयेऽद्यापि न चालमध्वराः॥ ३१

aho'tidhanyā vrajagoramaṇyaḥ

stanyāmṛtaṃ pītamatīva te mudā|

yāsāṃ vibho vatsatarātmajātmanā

yattṛptaye'dyāpi na cālamadhvarāḥ|| 31

अर्थ

मेरे स्वामी! जगत‍्के बड़े-बड़े यज्ञ सृष्टिके प्रारम्भसे लेकर अबतक आपको पूर्णतः तृप्त न कर सके। परन्तु आपने व्रजकी गायों और ग्वालिनोंके बछड़े एवं बालक बनकर उनके स्तनोंका अमृत-सा दूध बड़े उमंगसे पिया है। वास्तवमें उन्हींका जीवन सफल है, वे ही अत्यन्त धन्य हैं॥ ३१॥

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