॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.4
श्रेयःस्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते
नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ ४
śreyaḥsrutiṃ bhaktimudasya te vibho
kliśyanti ye kevalabodhalabdhaye|
teṣāmasau kleśala eva śiṣyate
nānyadyathā sthūlatuṣāvaghātinām|| 4
अर्थ
भगवन्! आपकी भक्ति सब प्रकारके कल्याणका मूलस्रोत— उद्गम है। जो लोग उसे छोड़कर केवल ज्ञानकी प्राप्तिके लिये श्रम उठाते और दुःख भोगते हैं, उनको बस, क्लेश-ही क्लेश हाथ लगता है, और कुछ नहीं—जैसे थोथी भूसी कूटनेवालेको केवल श्रम ही मिलता है, चावल नहीं॥ ४॥✎ 1931