श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! संसारके रचयिता ब्रह्माजीने इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की। इसके बाद उन्होंने तीन बार परिक्रमा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और फिर अपने गन्तव्य स्थान सत्यलोकमें चले गये॥ ४१॥
इत्यभिष्टूय भूमानं त्रिः परिक्रम्य पादयोः।
नत्वाभीष्टं जगद्धाता स्वधाम प्रत्यपद्यत॥ ४१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! संसारके रचयिता ब्रह्माजीने इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की। इसके बाद उन्होंने तीन बार परिक्रमा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और फिर अपने गन्तव्य स्थान सत्यलोकमें चले गये॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 228) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/14/41/