॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.51
तद् राजेन्द्र यथा स्नेहः स्वस्वकात्मनि देहिनाम्।
न तथा ममतालम्बिपुत्रवित्तगृहादिषु॥ ५१
tad rājendra yathā snehaḥ svasvakātmani dehinām|
na tathā mamatālambiputravittagṛhādiṣu|| 51
अर्थ
राजेन्द्र! यही कारण है कि सभी प्राणियोंका अपने आत्माके प्रति जैसा प्रेम होता है, वैसा अपने कहलानेवाले पुत्र, धन और गृह आदिमें नहीं होता॥ ५१॥