इससे यह बात सिद्ध होती है कि सभी प्राणी अपने आत्मासे ही सबसे बढ़कर प्रेम करते हैं और उसीके लिये इस सारे चराचर जगत्से भी प्रेम करते हैं॥ ५४॥
तस्मात् प्रियतमः स्वात्मा सर्वेषामपि देहिनाम्।
तदर्थमेव सकलं जगदेतच्चराचरम्॥ ५४
इससे यह बात सिद्ध होती है कि सभी प्राणी अपने आत्मासे ही सबसे बढ़कर प्रेम करते हैं और उसीके लिये इस सारे चराचर जगत्से भी प्रेम करते हैं॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 230) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/14/54/