श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तथापि भूमन् महिमागुणस्य ते

विबोद्धुमर्हत्यमलान्तरात्मभिः ।

अविक्रियात् स्वानुभवादरूपतो

ह्यनन्यबोध्यात्मतया न चान्यथा॥ ६

tathāpi bhūman mahimāguṇasya te

viboddhumarhatyamalāntarātmabhiḥ |

avikriyāt svānubhavādarūpato

hyananyabodhyātmatayā na cānyathā|| 6

अर्थ

हे अनन्त! आपके सगुण-निर्गुण दोनों स्वरूपोंका ज्ञान कठिन होनेपर भी निर्गुण स्वरूपकी महिमा इन्द्रियोंका प्रत्याहार करके शुद्धान्तःकरणसे जानी जा सकती है। (जाननेकी प्रक्रिया यह है कि) विशेष आकारके परित्यागपूर्वक आत्माकार अन्तःकरणका साक्षात्कार किया जाय। यह आत्माकारता घट-पटादि रूपके समान ज्ञेय नहीं है, प्रत्युत आवरणका भंगमात्र है। यह साक्षात्कार ‘यह ब्रह्म है’, ‘मैं ब्रह्मको जानता हूँ’ इस प्रकार नहीं, किन्तु स्वयंप्रकाश रूपसे ही होता है॥ ६॥

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