श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

विद्यन्तेऽभुक्तपूर्वाणि फलानि सुरभीणि च।

एष वै सुरभिर्गन्धो विषूचीनोऽवगृह्यते॥ २५

vidyante'bhuktapūrvāṇi phalāni surabhīṇi ca|

eṣa vai surabhirgandho viṣūcīno'vagṛhyate|| 25

अर्थ

उसके फल हैं तो बड़े सुगन्धित, परन्तु हमने कभी नहीं खाये। देखो न, चारों ओर उन्हींकी मन्द-मन्द सुगन्ध फैल रही है। तनिक-सा ध्यान देनेसे उसका रस मिलने लगता है॥ २५॥

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