इसके बाद कमलदललोचन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ व्रजमें आये। उस समय उनके साथी ग्वालबाल उनके पीछे-पीछे चलते हुए उनकी स्तुति करते जाते थे। क्यों न हो; भगवान्की लीलाओंका श्रवण-कीर्तन ही सबसे बढ़कर पवित्र जो है॥ ४१॥
कृष्णः कमलपत्राक्षः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
स्तूयमानोऽनुगैर्गोपैः साग्रजो व्रजमाव्रजत्॥ ४१
इसके बाद कमलदललोचन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ व्रजमें आये। उस समय उनके साथी ग्वालबाल उनके पीछे-पीछे चलते हुए उनकी स्तुति करते जाते थे। क्यों न हो; भगवान्की लीलाओंका श्रवण-कीर्तन ही सबसे बढ़कर पवित्र जो है॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.15.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 236) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/15/41/