श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार परम सुन्दर वृन्दावनको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही आनन्दित हुए। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गोवर्धनकी तराईमें, यमुनातटपर गौओंको चराते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करने लगे॥ ९॥
एवं वृन्दावनं श्रीमत् कृष्णः प्रीतमनाः पशून्।
रेमे संचारयन्नद्रेः सरिद्रोधस्सु सानुगः॥ ९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार परम सुन्दर वृन्दावनको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही आनन्दित हुए। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गोवर्धनकी तराईमें, यमुनातटपर गौओंको चराते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करने लगे॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.15.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 233) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/15/9/