श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

गोप्योऽनुरक्तमनसो भगवत्यनन्ते

तत्सौहृदस्मितविलोकगिरः स्मरन्त्यः।

ग्रस्तेऽहिना प्रियतमे भृशदुःखतप्ताः

शून्यं प्रियव्यतिहृतं ददृशुस्त्रिलोकम्॥ २०

gopyo'nuraktamanaso bhagavatyanante

tatsauhṛdasmitavilokagiraḥ smarantyaḥ|

graste'hinā priyatame bhṛśaduḥkhataptāḥ

śūnyaṃ priyavyatihṛtaṃ dadṛśustrilokam|| 20

अर्थ

गोपियोंका मन अनन्त गुणगणनिलय भगवान् श्रीकृष्णके प्रेमके रंगमें रँगा हुआ था। वे तो नित्य-निरन्तर भगवान्‌के सौहार्द, उनकी मधुर मुसकान, प्रेमभरी चितवन तथा मीठी वाणीका ही स्मरण करती रहती थीं। जब उन्होंने देखा कि हमारे प्रियतम श्यामसुन्दरको काले साँपने जकड़ रखा है, तब तो उनके हृदयमें बड़ा ही दुःख और बड़ी ही जलन हुई। अपने प्राणवल्लभ जीवनसर्वस्वके बिना उन्हें तीनों लोक सूने दीखने लगे॥ २०॥

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