श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

इत्थं स्वगोकुलमनन्यगतिं निरीक्ष्य

सस्त्रीकुमारमतिदुःखितमात्महेतोः।

आज्ञाय मर्त्यपदवीमनुवर्तमानः

स्थित्वा मुहूर्तमुदतिष्ठदुरंगबन्धात्॥ २३

itthaṃ svagokulamananyagatiṃ nirīkṣya

sastrīkumāramatiduḥkhitamātmahetoḥ|

ājñāya martyapadavīmanuvartamānaḥ

sthitvā muhūrtamudatiṣṭhaduraṃgabandhāt|| 23

अर्थ

परीक्षित्! यह साँपके शरीरसे बँध जाना तो श्रीकृष्णकी मनुष्यों-जैसी एक लीला थी। जब उन्होंने देखा कि व्रजके सभी लोग स्त्री और बच्चोंके साथ मेरे लिये इस प्रकार अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं और सचमुच मेरे सिवा इनका कोई दूसरा सहारा भी नहीं है, तब वे एक मुहूर्ततक सर्पके बन्धनमें रहकर बाहर निकल आये॥ २३॥

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