श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तपः सुतप्तं किमनेन पूर्वं

निरस्तमानेन च मानदेन।

धर्मोऽथ वा सर्वजनानुकम्पया

यतो भवांस्तुष्यति सर्वजीवः॥ ३५

tapaḥ sutaptaṃ kimanena pūrvaṃ

nirastamānena ca mānadena|

dharmo'tha vā sarvajanānukampayā

yato bhavāṃstuṣyati sarvajīvaḥ|| 35

अर्थ

अवश्य ही पूर्वजन्ममें इसने स्वयं मानरहित होकर और दूसरोंका सम्मान करते हुए कोई बहुत बड़ी तपस्या की है। अथवा सब जीवोंपर दया करते हुए इसने कोई बहुत बड़ा धर्म किया है तभी तो आप इसके ऊपर सन्तुष्ट हुए हैं। क्योंकि सर्व-जीवस्वरूप आपकी प्रसन्‍नताका यही उपाय है॥ ३५॥

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