श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

कालिन्द्यां कालियस्यासीद‍्ध्रदः कश्‍चिद् विषाग्‍निना।

श्रप्यमाणपया यस्मिन् पतन्त्युपरिगाः खगाः॥ ४

kālindyāṃ kāliyasyāsīddhradaḥ kaścid viṣāgninā|

śrapyamāṇapayā yasmin patantyuparigāḥ khagāḥ|| 4

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यमुनाजीमें कालिय नागका एक कुण्ड था। उसका जल विषकी गर्मीसे खौलता रहता था। यहाँतक कि उसके ऊपर उड़नेवाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे॥ ४॥✎ 2075

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2075 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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