श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये।

अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च॥ ४०

jñānavijñānanidhaye brahmaṇe'nantaśaktaye|

aguṇāyāvikārāya namaste'prākṛtāya ca|| 40

अर्थ

आप सब प्रकारके ज्ञान और अनुभवोंके खजाने हैं। आपकी महिमा और शक्ति अनन्त है। आपका स्वरूप अप्राकृत—दिव्य चिन्मय है, प्राकृतिक गुणों एवं विकारोंका आप कभी स्पर्श ही नहीं करते। आप ही ब्रह्म हैं, हम आपको नमस्कार कर रही हैं॥ ४०॥

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