श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अव्याकृतविहाराय सर्वव्याकृतसिद्धये।

हृषीकेश नमस्तेऽस्तु मुनये मौनशीलिने॥ ४७

avyākṛtavihārāya sarvavyākṛtasiddhaye|

hṛṣīkeśa namaste'stu munaye maunaśīline|| 47

अर्थ

आप मूलप्रकृतिमें नित्य विहार करते रहते हैं। समस्त स्थूल और सूक्ष्म जगत‍्की सिद्धि आपसे ही होती है। हृषीकेश! आप मननशील आत्माराम हैं। मौन ही आपका स्वभाव है। आपको हमारा नमस्कार है॥ ४७॥

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