जो मनुष्य दोनों समय तुझको दी हुई मेरी इस आज्ञाका स्मरण तथा कीर्तन करे, उसे साँपोंसे कभी भय न हो॥ ६१॥
य एतत् संस्मरेन्मर्त्यस्तुभ्यं मदनुशासनम्।
कीर्तयन्नुभयोः सन्ध्योर्न युष्मद् भयमाप्नुयात्॥ ६१
जो मनुष्य दोनों समय तुझको दी हुई मेरी इस आज्ञाका स्मरण तथा कीर्तन करे, उसे साँपोंसे कभी भय न हो॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 248) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/61/