यद्भयात् स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम्॥ ६३
dvīpaṃ ramaṇakaṃ hitvā hradametamupāśritaḥ|
yadbhayāt sa suparṇastvāṃ nādyānmatpādalāñchitam|| 63
अर्थ
मैं जानता हूँ कि तू गरुडके भयसे रमणक द्वीप छोड़कर इस दहमें आ बसा था। अब तेरा शरीर मेरे चरणचिह्नोंसे अंकित हो गया है। इसलिये जा, अब गरुड तुझे खायेंगे नहीं॥ ६३॥
द्वीपं रमणकं हित्वा ह्रदमेतमुपाश्रितः।
यद्भयात् स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम्॥ ६३
मैं जानता हूँ कि तू गरुडके भयसे रमणक द्वीप छोड़कर इस दहमें आ बसा था। अब तेरा शरीर मेरे चरणचिह्नोंसे अंकित हो गया है। इसलिये जा, अब गरुड तुझे खायेंगे नहीं॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 248) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/63/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1146 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमेतमुपाश्रित:। → ह्रदमेतमुपाश्रितः।