श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तस्य ह्रदे विहरतो भुजदण्डघूर्ण- ✎ 1145

वार्घोषमंग वरवारणविक्रमस्य।

आश्रुत्य तत् स्वसदनाभिभवं निरीक्ष्य

चक्षुःश्रवाः समसरत्तदमृष्यमाणः॥ ८

tasya hrade viharato bhujadaṇḍaghūrṇa-

vārghoṣamaṃga varavāraṇavikramasya|

āśrutya tat svasadanābhibhavaṃ nirīkṣya

cakṣuḥśravāḥ samasarattadamṛṣyamāṇaḥ|| 8

अर्थ

प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण कालियदहमें कूदकर अतुल बलशाली मतवाले गजराजके समान जल उछालने लगे। इस प्रकार जल-क्रीड़ा करनेपर उनकी भुजाओंकी टक्करसे जलमें बड़े जोरका शब्द होने लगा। आँखसे ही सुननेवाले कालिय नागने वह आवाज सुनी और देखा कि कोई मेरे निवासस्थानका तिरस्कार कर रहा है। उसे यह सहन न हुआ। वह चिढ़कर भगवान् श्रीकृष्णके सामने आ गया॥ ८॥✎ 2075

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1145 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदे → ह्रदे
  • #2075 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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