श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.18.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

क्वचिच्च दर्दुरप्लावैर्विविधैरुपहासकैः।

कदाचित् स्पन्दोलिकया कर्हिचिन्‍नृपचेष्टया॥ १५

kvacicca darduraplāvairvividhairupahāsakaiḥ|

kadācit spandolikayā karhicinnṛpaceṣṭayā|| 15

अर्थ

कहीं मेढकोंकी तरह फुदक-फुदककर चलते तो कभी मुँह बना-बनाकर एक-दूसरेकी हँसी उड़ाते। कहीं रस्सियोंसे वृक्षोंपर झूला डालकर झूलते तो कभी दो बालकोंको खड़ा कराकर उनकी बाँहोंके बलपर ही लटकने लगते। कभी किसी राजाकी नकल करने लगते॥ १५॥✎ 1663

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1663 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बल-पर → बलपर

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