अन्तमें उन्होंने देखा कि उनकी गौएँ मुंजाटवीमें रास्ता भूलकर डकरा रही हैं। उन्हें पाकर वे लौटानेकी चेष्टा करने लगे। उस समय वे एकदम थक गये थे और उन्हें प्यास भी बड़े जोरसे लगी हुई थी। इससे वे व्याकुल हो रहे थे॥ ५॥
मुंजाटव्यां भ्रष्टमार्गं क्रन्दमानं स्वगोधनम्।
सम्प्राप्य तृषिताः श्रान्तास्ततस्ते संन्यवर्तयन्॥ ५
अन्तमें उन्होंने देखा कि उनकी गौएँ मुंजाटवीमें रास्ता भूलकर डकरा रही हैं। उन्हें पाकर वे लौटानेकी चेष्टा करने लगे। उस समय वे एकदम थक गये थे और उन्हें प्यास भी बड़े जोरसे लगी हुई थी। इससे वे व्याकुल हो रहे थे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.19.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 257) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/19/5/