यद्यपि कंस देवकीको मार सकता था, किन्तु स्वयं ही वह इस अत्यन्त क्रूरताके विचारसे निवृत्त हो गया।* अब भगवान्के प्रति दृढ़ वैरका भाव मनमें गाँठकर उनके जन्मकी प्रतीक्षा करने लगा॥ २३॥
इति घोरतमाद् भावात् सन्निवृत्तः स्वयं प्रभुः।
आस्ते प्रतीक्षंस्तज्जन्म हरेर्वैरानुबन्धकृत्॥ २३
यद्यपि कंस देवकीको मार सकता था, किन्तु स्वयं ही वह इस अत्यन्त क्रूरताके विचारसे निवृत्त हो गया। अब भगवान्के प्रति दृढ़ वैरका भाव मनमें गाँठकर उनके जन्मकी प्रतीक्षा करने लगा॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.2.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 131) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/2/23/
टिप्पणियाँ
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जो कंस विवाहके मंगलचिह्नोंको धारण की हुई देवकीका गला काटनेके उद्योगसे न हिचका, वही आज इतना सद्-विचारवान् हो गया, इसका क्या कारण है? अवश्य ही आज वह जिस देवकीको देख रहा है, उसके अन्तरंगमें—गर्भमें श्रीभगवान् हैं। जिसके भीतर भगवान् हैं, उसके दर्शनसे सद्बुद्धिका उदय होना कोई आश्चर्य नहीं है।