श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधाम्‍नि

समाधिनाऽऽवेशितचेतसैके।

त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन

कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम्॥ ३०

tvayyambujākṣākhilasattvadhāmni

samādhinā''veśitacetasaike|

tvatpādapotena mahatkṛtena

kurvanti govatsapadaṃ bhavābdhim|| 30

अर्थ

कमलके समान कोमल अनुग्रहभरे नेत्रोंवाले प्रभो! कुछ बिरले लोग ही आपके समस्त पदार्थों और प्राणियोंके आश्रयस्वरूप रूपमें पूर्ण एकाग्रतासे अपना चित्त लगा पाते हैं और आपके चरणकमलरूपी जहाजका आश्रय लेकर इस संसारसागरको बछड़ेके खुरके गढ़ेके समान अनायास ही पार कर जाते हैं। क्यों न हो, अबतकके संतोंने इसी जहाजसे संसार-सागरको पार जो किया है॥ ३०॥

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