श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन-

स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ।

आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः

पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्‌घ्र‌यः ॥ ३२

ye'nye'ravindākṣa vimuktamānina-

stvayyastabhāvādaviśuddhabuddhayaḥ |

āruhya kṛcchreṇa paraṃ padaṃ tataḥ

patantyadho'nādṛtayuṣmadaṅghrayaḥ || 32

अर्थ

कमलनयन! जो लोग आपके चरणकमलोंकी शरण नहीं लेते तथा आपके प्रति भक्तिभावसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपनेको झूठ-मूठ मुक्त मानते हैं। वास्तवमें तो वे बद्ध ही हैं। वे यदि बड़ी तपस्या और साधनाका कष्ट उठाकर किसी प्रकार ऊँचे-से-ऊँचे पदपर भी पहुँच जायँ, तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं॥ ३२॥

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