श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो

भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः।

दिष्ट्यांकितां त्वत्पदकैः सुशोभनै-

र्द्रक्ष्याम गां द्यां च तवानुकम्पिताम्॥ ३८

diṣṭyā hare'syā bhavataḥ pado bhuvo

bhāro'panītastava janmaneśituḥ|

diṣṭyāṃkitāṃ tvatpadakaiḥ suśobhanai-

rdrakṣyāma gāṃ dyāṃ ca tavānukampitām|| 38

अर्थ

सम्पूर्ण दुःखोंके हरनेवाले भगवन्! आप सर्वेश्‍वर हैं। यह पृथ्वी तो आपका चरणकमल ही है। आपके अवतारसे इसका भार दूर हो गया। धन्य है! प्रभो! हमारे लिये यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि हमलोग आपके सुन्दर-सुन्दर चिह्नोंसे युक्त चरणकमलोंके द्वारा विभूषित पृथ्वीको देखेंगे और स्वर्गलोकको भी आपकी कृपासे कृतार्थ देखेंगे॥ ३८॥

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